पिछले तीन दशकों में तमिलनाडु विधानसभा कई ऐतिहासिक और विवादास्पद राजनीतिक मोड़ों की साक्षी रही है। 2003 में विधानसभा विशेषाधिकार हनन मामले में 'द हिंदू' और 'मुरासोली' के पत्रकारों को 15 दिन की जेल की सजा सुनाने का निर्णय देश भर में चर्चा का विषय बना, जिस पर बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी। 2011 में डीएमडीके के विजयकांत का डीएमके को पीछे छोड़कर विपक्ष का नेता बनना राज्य की राजनीति में एक बड़ा बदलाव था, जबकि 2012 में मुख्यमंत्री जयललिता और विजयकांत के बीच तीखी बहस के बाद उन्हें सदन से निलंबित कर दिया गया था। 2016 में जयललिता और एम.के. स्टालिन के बीच 'नमक नमे' यात्रा को लेकर हुई बहस भी चुनावी माहौल का हिस्सा बनी।
18 फरवरी 2017 को मुख्यमंत्री एडप्पादी के. पलानीस्वामी सरकार के विश्वास मत के दौरान सदन में भारी हंगामा हुआ, जिसमें अध्यक्ष की मेज और माइक क्षतिग्रस्त हो गए। डीएमके सदस्यों को बाहर निकालने के बाद सरकार ने 122-11 के अंतर से जीत हासिल की। वहीं, 2021 में वित्त मंत्री पलानीवेल त्यागराजन द्वारा राज्य का पहला पेपरलेस 'ई-बजट' पेश करना तकनीकी रूप से एक मील का पत्थर साबित हुआ।
हाल के वर्षों में राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच टकराव गहराया है। 2023 में राज्यपाल आर.एन. रवि द्वारा अभिभाषण के कुछ हिस्सों को छोड़ने पर मुख्यमंत्री स्टालिन ने आपत्ति जताई, जिसके बाद राज्यपाल सदन से बाहर चले गए। 2024 और 2025 में भी राष्ट्रीय गान और अभिभाषण के मुद्दों पर राज्यपाल के सदन से बाहर जाने की घटनाएं राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनीं। इन तीन दशकों में विधानसभा ने न केवल गंभीर राजनीतिक संघर्ष देखे हैं, बल्कि कई यादगार और रोचक संसदीय क्षण भी दर्ज किए हैं।

