भारत और अमेरिका में ऊर्जा की बढ़ती कीमतों और भू-राजनीतिक तनाव के कारण महंगाई का दबाव लगातार बढ़ रहा है। भारत में सितंबर महीने में खुदरा महंगाई दर 21 महीने के उच्चतम स्तर 5.54 प्रतिशत पर पहुंच गई, जबकि थोक महंगाई दर बढ़कर 11.39 प्रतिशत हो गई है। इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च का अनुमान है कि थोक महंगाई फरवरी 2027 तक दहाई अंक में बनी रह सकती है और अक्टूबर में खाद्य महंगाई में और वृद्धि होने की आशंका है।
अमेरिका में भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही है, जहां सितंबर में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर 3.7 प्रतिशत दर्ज की गई। इस वृद्धि में 60 प्रतिशत से अधिक योगदान गैसोलीन जैसी ऊर्जा कीमतों का रहा, जबकि खाद्य और ऊर्जा को छोड़कर कोर महंगाई दर भी 2.6 प्रतिशत तक पहुंच गई। आवास और सेवाओं के क्षेत्र में कीमतों का दबाव यह संकेत देता है कि महंगाई अर्थव्यवस्था में गहराई से पैठ बना रही है।
दोनों देशों के नीति निर्माता अब आर्थिक विकास को प्रभावित किए बिना महंगाई पर काबू पाने की चुनौती का सामना कर रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा नीतिगत दरों में 50 से 75 आधार अंकों की बढ़ोतरी की संभावना है, वहीं अमेरिकी फेडरल रिजर्व के सामने श्रम बाजार में कमजोरी और सख्त मौद्रिक नीति के बीच संतुलन बनाने का कठिन निर्णय है। वैश्विक स्तर पर कमोडिटी और ऊर्जा कीमतों में जारी अस्थिरता उपभोक्ताओं और केंद्रीय बैंकों के लिए सबसे बड़ा जोखिम बनी हुई है।



