अमेरिका, रूस और चीन चंद्रमा पर परमाणु रिएक्टर स्थापित करने की दौड़ में शामिल हो गए हैं, ताकि भविष्य में वहां बनने वाले बेस और खनन कार्यों के लिए ऊर्जा प्राप्त की जा सके। नासा 2030 तक अपना 20-किलोवाट का 'लूनर रिएक्टर 1' तैनात करने की योजना बना रहा है, जबकि रूस और चीन मिलकर 'सेलेना' नामक 10-किलोवाट के रिएक्टर पर काम कर रहे हैं, जिसे 2036 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इन रिएक्टरों का मुख्य उद्देश्य चंद्रमा के क्रेटरों से जमी हुई बर्फ निकालकर उसे पीने के पानी, ऑक्सीजन और रॉकेट ईंधन में बदलना है।
विशेषज्ञों के अनुसार, चंद्रमा की दो सप्ताह लंबी रातों के दौरान सौर पैनल प्रभावी नहीं होते, इसलिए परमाणु ऊर्जा ही वहां अन्वेषण के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प है। हालांकि तकनीक के स्तर पर यह संभव है, लेकिन इसे चंद्रमा पर उतारना, स्थापित करना और लंबी अवधि तक सुरक्षित रखना बड़ी चुनौती है। सुरक्षा के मद्देनजर, रिएक्टरों को चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित रूप से स्थापित होने तक निष्क्रिय रखा जाएगा।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि 1967 की 'आउटर स्पेस ट्रीटी' चंद्रमा पर क्षेत्रीय दावों को तो रोकती है, लेकिन परमाणु ऊर्जा के उपयोग पर प्रतिबंध नहीं लगाती। इसके बावजूद, संभावित दुर्घटनाओं और अंतरिक्ष में खतरनाक उपकरणों के लिए स्पष्ट जवाबदेही ढांचे की कमी को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं। 1978 में सोवियत उपग्रह के दुर्घटनाग्रस्त होने जैसी घटनाएं अंतरिक्ष में परमाणु सामग्री के उपयोग से जुड़े जोखिमों को रेखांकित करती हैं।




