दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन में नेपाल की हिस्सेदारी मात्र 0.1 प्रतिशत है, लेकिन यह देश जलवायु परिवर्तन के सबसे गंभीर प्रभावों का सामना कर रहा है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के अनुसार, 2025 में वैश्विक ऊर्जा-आधारित CO₂ उत्सर्जन 0.4 प्रतिशत बढ़कर 38.4 बिलियन टन के नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। वहीं, क्लाइमेट ट्रेस के आंकड़ों के मुताबिक, जून 2026 में वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पिछले साल की तुलना में 0.6 प्रतिशत अधिक रहा।
इस संकट का सीधा असर हिमालयी क्षेत्रों पर दिख रहा है। 26 अगस्त 2026 को नेपाल-तिब्बत सीमा पर हुए भीषण भूस्खलन और ग्लेशियर टूटने की घटना ने भारी तबाही मचाई। नेपाल के वित्त मंत्री के अनुसार, इस आपदा से उबरने के लिए 4 से 5 बिलियन अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता है, जो देश की अर्थव्यवस्था का लगभग दसवां हिस्सा है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि वर्तमान स्थिति बनी रही, तो अगले चार वर्षों में वैश्विक तापमान वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस के स्तर को पार कर सकती है।
यह जलवायु न्याय का एक बड़ा विरोधाभास है कि प्रदूषण फैलाने वाले बड़े देशों की गलतियों की कीमत नेपाल जैसे छोटे और कम उत्सर्जन करने वाले देश चुका रहे हैं। नेपाल की यह त्रासदी दुनिया के लिए एक चेतावनी है कि कार्बन उत्सर्जन का प्रभाव सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। अब समय आ गया है कि नेपाल जैसे प्रभावित देशों को जलवायु अनुकूलन निधि, आपदा प्रबंधन तकनीक और नुकसान की भरपाई के लिए तत्काल अंतरराष्ट्रीय सहायता प्रदान की जाए।




