वर्ष 1972 में एम.जी. रामचंद्रन और एम. कल्याणसुंदरम द्वारा तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि के नेतृत्व वाली द्रमुक सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए थे। आपातकाल के दौरान 31 जनवरी 1976 को द्रमुक सरकार को बर्खास्त कर दिया गया और 3 फरवरी 1976 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश आर.एस. सरकारिया की अध्यक्षता में एक जांच आयोग का गठन किया गया। आयोग ने वीरनम जल परियोजना, सड़क अनुबंध और बिजली संयंत्र सहित 28 मामलों की जांच की, जिसके लिए 1,600 गवाहों के बयान और हजारों दस्तावेज जुटाए गए थे।
हाल ही में मुख्यमंत्री विजय ने विधानसभा में वीरनम परियोजना का उल्लेख करते हुए 29 लाख रुपये के कथित अवैध लेनदेन का मुद्दा उठाया। हालांकि, सरकारिया आयोग की अंतिम रिपोर्ट में कहा गया कि करुणानिधि द्वारा अवैध धन प्राप्त करने का आरोप 'संदेह से परे' साबित नहीं हुआ, क्योंकि इसके लिए पर्याप्त पुष्टिकारक साक्ष्य मौजूद नहीं थे। आयोग एक जांच निकाय था, न कि आपराधिक अदालत।
तमिलनाडु की राजनीति में लंबे समय से यह दावा किया जाता रहा है कि सरकारिया आयोग ने करुणानिधि के भ्रष्टाचार को 'वैज्ञानिक भ्रष्टाचार' करार दिया था। हालांकि, यह एक राजनीतिक मिथक है, क्योंकि आयोग की आधिकारिक रिपोर्ट में 'वैज्ञानिक भ्रष्टाचार' शब्द का कहीं भी उल्लेख नहीं किया गया है।



