भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मौद्रिक नीति की समीक्षा करते हुए रेपो रेट में 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी की है, जिससे यह 5.25 फीसदी से बढ़कर 5.50 फीसदी हो गया है। लगभग चार वर्षों में यह पहली बार है जब केंद्रीय बैंक ने दरों में वृद्धि की है। बढ़ती महंगाई, ईंधन की कीमतों में उछाल और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है। इस कदम के साथ ही RBI ने अपनी नीतिगत रुख को 'न्यूट्रल' से बदलकर 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' कर दिया है, जिससे भविष्य में और अधिक बढ़ोतरी की संभावना बनी हुई है।
रेपो रेट बढ़ने से बैंकों के लिए फंड जुटाना महंगा हो जाएगा, जिसका सीधा असर ग्राहकों पर पड़ेगा। होम लोन, ऑटो लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरें बढ़ने की संभावना है, जिससे ग्राहकों की EMI या लोन की अवधि बढ़ सकती है। MSME और अन्य व्यावसायिक ऋणों पर भी इसका असर पड़ेगा, जिससे कंपनियों की वित्तीय लागत में वृद्धि होगी। हालांकि, यह बदलाव फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) करने वाले निवेशकों के लिए सकारात्मक हो सकता है, क्योंकि बैंकों द्वारा जमा दरों में भी धीरे-धीरे बढ़ोतरी की उम्मीद है।
RBI ने वित्त वर्ष 2027 के लिए जीडीपी विकास दर के अनुमान को 6.7 फीसदी से बढ़ाकर 7.1 फीसदी कर दिया है, जबकि महंगाई दर का अनुमान 5.2 फीसदी रहने का अनुमान जताया है। विशेषज्ञों का मानना है कि कर्ज लेने वालों को अब अपनी लोन शर्तों, विशेषकर फ्लोटिंग रेट वाले ऋणों की समीक्षा करनी चाहिए। वहीं, शेयर बाजार में इस निर्णय के बाद उतार-चढ़ाव देखा गया है, क्योंकि उच्च ब्याज दरें विशेष रूप से बैंकिंग, रियल एस्टेट और ऑटो सेक्टर के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती हैं।



