भारत में प्रमुख खाद्य और पेय पदार्थ कंपनियों ने सरकार पर दबाव बनाकर पैकेटबंद उत्पादों पर रंग-कोडित पोषण चेतावनी लेबल लगाने की योजना को रुकवा दिया है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने पहले उत्पादों पर चीनी, नमक और वसा की अधिकता को दर्शाने के लिए स्पष्ट चेतावनी लेबल लगाने पर विचार किया था, लेकिन उद्योग जगत के विरोध के बाद अब केवल साधारण ब्लैक-एंड-व्हाइट तालिका का प्रस्ताव रखा गया है। इस निर्णय को लेकर जन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है, जिस पर सुनवाई जारी है।
कोका-कोला जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों और व्यापार संघों का तर्क है कि चेतावनी लेबल से उत्पादों की बिक्री पर गलत असर पड़ेगा। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि यही कंपनियां यूरोप के बाजारों में स्वेच्छा से ट्रैफिक-लाइट स्टाइल लेबलिंग का उपयोग करती हैं। शोध के अनुसार, भारत के लगभग 80 प्रतिशत पैकेटबंद खाद्य उत्पाद उच्च चीनी, नमक या वसा की श्रेणी में आते हैं, जिससे कंपनियों को सख्त लेबलिंग से आर्थिक नुकसान का डर है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि वर्ष 2050 तक भारत में 45 करोड़ लोग मोटापे का शिकार हो सकते हैं। उद्योग के विरोध के बावजूद, बढ़ती उपभोक्ता जागरूकता के कारण नेस्ले जैसी कुछ कंपनियों ने अपने उत्पादों में बदलाव शुरू किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में जन स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर जोर दिया है।



