TNPSC ग्रुप 4 परीक्षा की तैयारी के लिए संगम काल के तीन प्रमुख राजवंशों—चेर, चोल और पांड्य—का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है। छठी कक्षा की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक के अनुसार, संगम काल का समय लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ईस्वी तक माना जाता है। इस काल में तमिल क्षेत्र पर इन तीन राजवंशों और कई छोटे सरदारों का शासन था। संगम का अर्थ उन कवियों की सभा से है, जिन्होंने तमिल साहित्य का सृजन किया।
इन राजवंशों की पहचान के लिए ऐतिहासिक साक्ष्य महत्वपूर्ण हैं। चेर राजवंश का प्रतीक धनुष-बाण था और उनकी राजधानी वंजी/करूर थी। चोलों का प्रतीक बाघ था और उनकी राजधानी उरैयूर थी, जबकि पांड्यों का प्रतीक दो मछलियाँ थीं और उनकी राजधानी मदुरै थी। संगम कालीन चोल राजा करिकालन ने वेन्नी के युद्ध में विजय प्राप्त की और कावेरी नदी पर कल्लणई बांध का निर्माण कराया। पांड्य राजा नेदुनचेझियन ने तलैयालंगानम के युद्ध में जीत हासिल की थी, और चेर राजा सेनगुट्टुवन को 'पत्तिनी' पंथ से जोड़ा जाता है।
प्रशासनिक व्यवस्था में राजा की सहायता के लिए 'ऐंपेरंगुझु' (पांच सदस्यीय परिषद) और 'एन्पेरायम' (आठ सदस्यीय समूह) जैसी संस्थाएं थीं। भूमि कर को 'इरई' और सीमा शुल्क को 'सुंगम' कहा जाता था। उस समय मुसिरी, तोंडी, पुहार और कोरकई प्रमुख व्यापारिक बंदरगाह थे। व्यापारिक वस्तुओं में काली मिर्च, मोती और वस्त्र प्रमुख थे। मदुरै में दिन और रात के बाजार क्रमशः 'नालंगडी' और 'अल्लांगडी' कहलाते थे। यह जानकारी TNPSC ग्रुप 4 के सामान्य अध्ययन पाठ्यक्रम के अंतर्गत दक्षिण भारतीय इतिहास और तमिलनाडु के इतिहास के लिए आधारभूत है।


