TNPSC ग्रुप 4 परीक्षा की तैयारी के अंतर्गत आज का सत्र तमिल साहित्यिक विरासत पर केंद्रित है। तमिल साहित्य केवल कविताओं का संग्रह नहीं है, बल्कि यह प्राचीन तमिल समाज की राजनीति, व्यापार, पारिवारिक जीवन और सामाजिक परिवर्तनों को समझने का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत है। इतिहासकार इन साहित्यिक साक्ष्यों का मिलान शिलालेखों, सिक्कों और पुरातात्विक खोजों के साथ करते हैं। पाठ्यक्रम के अनुसार, संगम काल से लेकर आधुनिक युग तक के साहित्य का अध्ययन आवश्यक है।
साहित्यिक कालक्रम को मुख्य रूप से संगम काल, भक्ति काल और आधुनिक काल में विभाजित किया गया है। संगम साहित्य में 'एट्टुत्तोगई' (आठ संकलन) और 'पत्तुपत्तु' (दस लंबी कविताएं) प्रमुख हैं, जो 'अगम' (आंतरिक जीवन) और 'पुरम' (सार्वजनिक जीवन) विषयों पर आधारित हैं। इसके अलावा, तोल्काप्पियम व्याकरण का प्राचीन ग्रंथ है, जबकि तिरुक्कुरल जैसे ग्रंथ नैतिकता और जीवन मूल्यों पर प्रकाश डालते हैं। मध्यकाल में भक्ति साहित्य का विकास हुआ, जिसमें नयनमारों और आलवारों के भजनों के साथ-साथ कंब रामायण और पेरियपुराण जैसे महाकाव्य महत्वपूर्ण हैं।
आधुनिक तमिल साहित्य 19वीं और 20वीं शताब्दी में मुद्रण और शिक्षा के प्रसार के साथ विकसित हुआ। यू.वी. स्वामीनाथ अय्यर और सी.वी. दामोदरम पिल्लई जैसे विद्वानों ने प्राचीन पांडुलिपियों को खोजकर उन्हें प्रकाशित किया। सुब्रमण्यम भारती और भारतदासन जैसे कवियों ने सामाजिक सुधार, समानता और स्वतंत्रता के विचारों को साहित्य में पिरोया। आज का अध्ययन सत्र इन प्रमुख साहित्यिक श्रेणियों, लेखकों और उनके योगदानों को समझने के लिए तैयार किया गया है, जो परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

