तमिलनाडु में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध चले स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 1852 से 1942 तक का काल अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दौरान मद्रास नेटिव एसोसिएशन (1852) और मद्रास महाजन सभा (1884) जैसे राजनीतिक संगठनों ने प्रशासनिक सुधारों और भारतीय प्रतिनिधित्व की मांग उठाई। 1887 में मद्रास में आयोजित कांग्रेस के तीसरे अधिवेशन की अध्यक्षता बदरुद्दीन तैयबजी ने की थी। 'द हिंदू' (1878) और 'स्वदेशमित्रन' (1891) जैसे समाचार पत्रों ने जन-जागरूकता फैलाने में अहम भूमिका निभाई।
1905 के बंगाल विभाजन के बाद स्वदेशी आंदोलन ने जोर पकड़ा। वी.ओ. चिदंबरनार (वी.ओ.सी.) ने तूतीकोरिन में स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी की स्थापना की और 'गैलिया' व 'लावो' नामक जहाज चलाकर ब्रिटिश व्यापारिक एकाधिकार को चुनौती दी। 1908 में कोरल मिल हड़ताल के बाद वी.ओ.सी. और सुब्रमण्यम शिवा की गिरफ्तारी ने जन-आक्रोश को जन्म दिया। वहीं, 1911 में वांचीनाथन द्वारा மணியாச்சி (Maniyachi) रेलवे स्टेशन पर ब्रिटिश अधिकारी रॉबर्ट ऐश की हत्या क्रांतिकारी गतिविधियों का एक प्रमुख हिस्सा रही।
बाद के वर्षों में एनी बेसेंट का होमरूल आंदोलन, 1920-22 का असहयोग आंदोलन और 1930 में राजाजी के नेतृत्व में हुआ वेदारण्यम नमक सत्याग्रह स्वतंत्रता संघर्ष के मील के पत्थर साबित हुए। 1932 में तिरुपुर कुमारन ने राष्ट्रीय ध्वज की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए, जिसके कारण उन्हें 'कोडीकाथा कुमारन' कहा जाता है। 1937 में मद्रास में पहली कांग्रेस सरकार बनी, जो 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध में भारत को शामिल करने के विरोध में इस्तीफा दे गई। अंततः 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान तमिलनाडु में भी व्यापक हड़तालें और विरोध प्रदर्शन हुए।



