नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में देश भर में लगभग 94,000 सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए हैं, जिसके चलते सरकारी स्कूलों में छात्रों के नामांकन में भारी गिरावट आई है। राज्यों ने इन स्कूलों को बंद करने के पीछे 'तर्कसंगत बनाने' (rationalisation) का तर्क दिया है, लेकिन उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और जम्मू-कश्मीर इस सूची में सबसे आगे हैं। इस प्रशासनिक बदलाव के कारण ग्रामीण क्षेत्रों के लाखों बच्चे शिक्षा से दूर हो गए हैं या उनके स्कूल छोड़ने का खतरा बढ़ गया है।
मध्य प्रदेश में ऑडिट से पता चला है कि 11 लाख से अधिक बच्चे 'ड्रॉप बॉक्स' श्रेणी में हैं, यानी उनके शिक्षा व्यवस्था से बाहर होने की आशंका है। वहीं, जम्मू-कश्मीर में 4,300 से अधिक स्कूलों को बंद या विलय कर दिया गया है, जिससे छात्रों को लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है। आलोचकों का कहना है कि यह शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत अनिवार्य 'पड़ोसी स्कूल' के प्रावधान का उल्लंघन है, जिसका सबसे बुरा असर अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों पर पड़ रहा है।
केंद्र सरकार का कहना है कि शिक्षा प्रबंधन राज्यों का विषय है, लेकिन विशेषज्ञों का तर्क है कि RTE एक केंद्रीय कानून है। गुणवत्ता मानकों के अभाव और स्कूल प्रबंधन समितियों के निष्क्रिय होने से अभिभावकों की आवाज दब गई है। सरकारी स्कूलों की संख्या घटने से निजी स्कूलों में नामांकन बढ़ा है, जिससे गरीब परिवारों के लिए शिक्षा की पहुंच और अधिक कठिन हो गई है।
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