तमिलनाडु सरकार ने हाल ही में RTI से संबंधित अपने एक विवादास्पद सरकारी आदेश को भारी विरोध के बाद वापस ले लिया है। राज्य में यह एक पैटर्न बन गया है कि पहले कोई सरकारी आदेश जारी किया जाता है, फिर उसका विरोध होता है और अंततः सरकार उसे वापस ले लेती है।
लोकतंत्र में विपक्ष की राय सुनकर निर्णय बदलना सकारात्मक है, लेकिन ऐसे महत्वपूर्ण फैसलों के कानूनी और सामाजिक प्रभावों का आकलन आदेश जारी करने से पहले क्यों नहीं किया जाता? बार-बार लिए गए फैसलों को वापस लेने की इस प्रवृत्ति ने सरकार की निर्णय लेने की प्रक्रिया और पूर्व-समीक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या मुख्यमंत्री विजय के स्तर पर इन आदेशों की गहन समीक्षा और मंजूरी के बाद ही इन्हें जारी किया जाता है, या फिर विरोध के बाद ही सरकार को इनके परिणामों का एहसास होता है? सुशासन के लिए विरोध सुनना जरूरी है, लेकिन निर्णय लेने से पहले पूर्ण समीक्षा करना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।

