भारतीय न्यायपालिका देश के कानूनों की व्याख्या करने, विवादों को सुलझाने और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने वाली एक एकीकृत प्रणाली है। इसमें सर्वोच्च न्यायालय शीर्ष पर है, जिसके बाद उच्च न्यायालय और जिला अदालतें आती हैं। 'कानून का शासन' (Rule of Law) का अर्थ है कि शासक और नागरिक दोनों ही कानून के अधीन हैं और कोई भी कानून से ऊपर नहीं है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता, जो कि भारतीय संविधान का आधारभूत ढांचा है, यह सुनिश्चित करती है कि न्यायाधीश बिना किसी राजनीतिक दबाव के निर्णय ले सकें।
अनुच्छेद 124 के तहत स्थापित सर्वोच्च न्यायालय का उद्घाटन 28 जनवरी 1950 को हुआ था, जिसके पहले मुख्य न्यायाधीश हरिलाल जे. कनिया थे। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होते हैं। अनुच्छेद 141 के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित कानून अन्य सभी अदालतों के लिए बाध्यकारी हैं। वहीं, अनुच्छेद 214 राज्यों के लिए उच्च न्यायालयों का प्रावधान करता है, जहां न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु 62 वर्ष है। अनुच्छेद 32 और 226 के तहत सर्वोच्च और उच्च न्यायालयों को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए पांच प्रकार की रिट (Habeas Corpus, Mandamus, Prohibition, Certiorari, Quo Warranto) जारी करने की शक्ति प्राप्त है।
न्यायिक समीक्षा के माध्यम से अदालतें कानूनों की संवैधानिकता की जांच करती हैं। इसके अतिरिक्त, लोक अदालतों के माध्यम से विवादों का निपटारा किया जाता है, जिसे 1987 के कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम के तहत वैधानिक दर्जा प्राप्त है। मद्रास उच्च न्यायालय की स्थापना 1862 में हुई थी, जिसका अधिकार क्षेत्र तमिलनाडु और पुडुचेरी तक विस्तृत है। आज के पाठ में इन संवैधानिक अनुच्छेदों और न्यायपालिका की कार्यप्रणाली के साथ-साथ इस सप्ताह के राजनीति विज्ञान के विषयों का पुनरीक्षण भी शामिल है।

