भारत के इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं, क्योंकि सरकार द्वारा रियायती दरों पर अनाज डिस्टिलरीज को उपलब्ध कराया जा रहा है। सरकार का तर्क है कि यह पहल पेट्रोलियम आयात कम करने और ऊर्जा सुरक्षा के लिए है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि ईंधन के लिए खाद्यान्न का उपयोग खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा है। आंकड़ों के अनुसार, सरकार इथेनॉल उत्पादकों को चावल खरीद लागत से लगभग 40 प्रतिशत कम कीमत पर बेच रही है, जिससे कार्यक्रम की आर्थिक व्यवहार्यता पर सवाल उठ रहे हैं।
मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने खाद्य बनाम ईंधन के संतुलन का आकलन किए बिना E25 जैसे उच्च सम्मिश्रण लक्ष्यों की ओर बढ़ने के प्रति आगाह किया है। वर्तमान में भारत 19.24 प्रतिशत इथेनॉल सम्मिश्रण तक पहुंच चुका है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि अनाज और गन्ने से इथेनॉल उत्पादन की लागत पेट्रोल की रिफाइनरी गेट कीमत से अधिक है, जिससे तेल विपणन कंपनियों पर वित्तीय बोझ बढ़ रहा है।
कृषि विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि औद्योगिक ईंधन के लिए खाद्यान्न का उपयोग मानवीय आवश्यकताओं की अनदेखी है। भारतीय खाद्य निगम (FCI) के अधिशेष स्टॉक से फीडस्टॉक की आपूर्ति अनिवार्य करने के सरकारी फैसले पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आलोचकों का तर्क है कि यह मॉडल भारी सब्सिडी पर टिका है, जिसका वित्तीय भार अंततः करदाताओं पर पड़ रहा है।


