वैश्विक स्तर पर बॉन्ड यील्ड कई वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है, जो लंबे समय तक महंगे कर्ज के दौर की शुरुआत का संकेत है। इस प्रवृत्ति के पीछे सरकारी उधारी में वृद्धि, तेल की कीमतों से जुड़ी मुद्रास्फीति की चिंताएं और केंद्रीय बैंकों द्वारा सख्त मौद्रिक नीति बनाए रखने की उम्मीदें प्रमुख कारण हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति उन देशों के लिए गंभीर वित्तीय दबाव पैदा कर रही है, जिन पर पहले से ही भारी कर्ज और राजकोषीय घाटा है।
कॉर्पोरेट जगत में, विशेष रूप से फ्लोटिंग-रेट कर्ज वाले व्यवसायों और रियल एस्टेट क्षेत्र पर रिफाइनेंसिंग लागत बढ़ने का खतरा मंडरा रहा है। साथ ही, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस परियोजनाओं के लिए पूंजी की बढ़ती मांग ने प्रतिस्पर्धा को और तेज कर दिया है। इसका असर आम उपभोक्ताओं पर भी पड़ रहा है, जिससे होम लोन और अन्य ऋणों की किस्तें महंगी हो रही हैं।
हालांकि मजबूत आय के कारण शेयर बाजार अभी स्थिर बने हुए हैं, लेकिन विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बढ़ती यील्ड भविष्य में स्टॉक वैल्यूएशन को प्रभावित कर सकती है। दूसरी ओर, बॉन्ड निवेशकों के लिए यह स्थिति नए अवसर लेकर आई है। डॉयचे बैंक के विश्लेषकों के अनुसार, बॉन्ड से मिलने वाला उच्च कूपन भुगतान निकट भविष्य में संभावित पूंजीगत नुकसान की भरपाई करने में सहायक हो सकता है।





