आज के दौर में भोजन को लेकर एक गहरा डर व्याप्त है। कभी 'भोजन ही औषधि है' मानने वाले हमारे पूर्वजों के विपरीत, आज हम ऐसी स्थिति में हैं जहाँ भोजन के लिए ही दवाओं की आवश्यकता पड़ रही है। घर का बना खाना हो या बाहर का, हर जगह मिलावट और स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं ने लोगों को सशंकित कर दिया है। नूडल्स जैसे उत्पादों पर लगे प्रतिबंध और बाद में उनकी वापसी ने आम जनता के मन में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सुरक्षा मानकों में अचानक क्या बदलाव आया। जब किसी खाद्य पदार्थ में खामी पाई जाती है, तो क्या यह केवल एक बैच की समस्या है या पूरी उत्पादन प्रक्रिया की? उपभोक्ताओं को यह जानने का पूरा अधिकार है कि वे जो खा रहे हैं, वह सुरक्षित है या नहीं।
होटलों और ऑनलाइन फूड डिलीवरी में भी स्थिति चिंताजनक है। अक्सर खराब मांस, अस्वच्छ रसोई और एक्सपायरी सामान की खबरें सामने आती हैं। ऑनलाइन ऑर्डर में भोजन खराब निकलने पर केवल पैसे वापस (रिफंड) कर देना समाधान नहीं है, क्योंकि स्वास्थ्य को हुए नुकसान की भरपाई संभव नहीं है। वहीं, घर पर खाना पकाने के लिए बाजार से खरीदी गई सब्जियां और अन्य सामग्री भी सुरक्षित होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं देतीं। कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग और सब्जियों के लंबे समय तक खराब न होने की प्रवृत्ति ने कई संदेह पैदा किए हैं। खाद्य सुरक्षा अधिकारियों द्वारा की जाने वाली छापेमारी और जुर्माना केवल एक सीमित प्रक्रिया बनकर रह गई है, जबकि आम जनता को पारदर्शी और स्पष्ट जानकारी की आवश्यकता है।
आज 30 साल की उम्र में ही लोग मधुमेह, उच्च रक्तचाप और मोटापे जैसी बीमारियों से जूझ रहे हैं। यदि हम आज अपने स्वास्थ्य को लेकर इतने चिंतित हैं, तो आने वाली पीढ़ी का भविष्य क्या होगा? हम बच्चों के लिए संपत्ति और शिक्षा तो जुटा रहे हैं, लेकिन क्या हम उन्हें एक स्वस्थ खाद्य वातावरण दे पा रहे हैं? यदि हम अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा अस्पतालों में खर्च करने के लिए मजबूर हैं, तो इस विकास का क्या अर्थ है? यह समय है कि खाद्य सुरक्षा एजेंसियां केवल कार्रवाई ही न करें, बल्कि जनता के प्रति अपनी जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करें, ताकि हम अगली पीढ़ी को बीमारियों के बजाय एक स्वस्थ जीवन विरासत में दे सकें।

