सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को पूछताछ के लिए हिरासत में लेते ही उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने की 24 घंटे की समय सीमा शुरू हो जाती है। न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदावरकर की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत संवैधानिक जनादेश औपचारिक गिरफ्तारी के समय से नहीं, बल्कि उस क्षण से लागू होता है जब व्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया जाता है।
अदालत ने उन उच्च न्यायालयों के फैसलों को खारिज कर दिया जिनमें प्रारंभिक हिरासत और औपचारिक गिरफ्तारी के बीच समय की छूट दी गई थी। पीठ ने जोर देकर कहा कि अनुच्छेद 22(2) औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करने से पहले जांच या पूछताछ में बिताए गए समय को बाहर रखने की अनुमति नहीं देता है।
इस निर्णय का उद्देश्य पुलिस द्वारा कानूनी आवश्यकताओं से बचने के लिए औपचारिक गिरफ्तारी में देरी करने की प्रथा पर रोक लगाना है। अदालत ने इस खामी को दूर कर जांच एजेंसियों पर अंकुश लगाने और बिना रिकॉर्ड की गई हिरासत के दौरान होने वाली पुलिसिया हिंसा के जोखिम को कम करने का प्रयास किया है।


